इस रचना का श्रद्धेय माखनलाल चतुर्वेदी की अमर कृति
पुष्प की अभिलाषा से किसी तरह का कोई संबंध नहीं है।
अगर कोई संबंध पाया जाता है
तो इसे महज एक संयोग कहा जाएगा।
चाह यही की बॉस से
अपने पैसे बढ़वाऊं
चाह यही की गद्दे वाली
कुर्सी पर बैठूं, इठलाऊं
चाह यही कि सेक्रेट्री को
फोन करूं, अंदर बुलाऊं
चाह यही कि कॉलर में
मैं भी एक टाई लगाऊं
चाह यही कि किसी अर्जी पे
मैं भी इक चिड़िया बिठाऊं
चाह यही कि मिलने वालों को
घंटों बाहर बैठाऊं
चाह यही कि मेरे घुसते ही
सबको खड़ा मैं पाऊं
चाह यही कि कुछ अपने
चमचे मैं भी बनाऊं
मुझे दोस्त मत देना गाली
ऐसे पद पर गर जाऊं बैठ
रात दिन सब धोक लगाकर
रखना चाहेंगे मुझको सैट
- संजय गोस्वामी
Tuesday 6 May 2008
कर्मचारी की अभिलाषा
Posted by आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) at 4:26 PM
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